मार्च 2008 के लिए पुरालेख

>मीना कुमारी – कविता – कुमार मुकुल

मार्च 23, 2008

>
दर्द
तुम्‍हारी आंखों में नहीं
हमारी रगों में होता है

छू देती हैं
निगाहें

उभर आता है दर्द
फफोले-फफोले।

यह कविता मेरे दूसरे कविता संकलन सभ्‍यता और जीवन से है।

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>पीपल की होली – ‘सभ्‍यता और जीवन’ से एक कविता – कुमार मुकुल

मार्च 22, 2008

>यूकलिप्‍टस के पड़ोसी पीपल नेअबके होली में वो रंग जमायाकि उसके सारे साथी दंग रह गएसहस्‍त्रबाहु सी भुजाओं सेछिड़क रहा था वह सुग्‍गापंखी रंगसुनहली आभा से दिप रहा था अंग-अंग उसकाअतिथि तोता-मैना और काली कोयलियासब लूट रहे थे महाभोज का आनंदपरसने का अंदाज भी था नयाहर शाखा पर पुष्‍ट पकवान थे बफेडिनर की तरहबस खाने का ढ़ंग था हिन्‍दुस्‍तानी प्‍योरचोंच के आगे क्‍या चम्‍मच का चलता जोरभोजनोपरांत अतिथियों ने गाया समूहगानमस्‍ती में डूब गया सारा जहानपता ही ना चला कैसे बीता दिनचांदनी से कब चह-चहा गया आसमान।समुद्र के आंसू के बाद सभ्‍यता और जीवन मेरी किशोर से युवा होते कवि की कविताओं का दूसरा संकलन था जिसे पूर्व की तरह पिता ने छपवाया था। 1990 में जब यह छपा था तब मैं सहरसा छोड़ पटना आ चुका था। पटना में आते ही सायंस कालेज में हिन्‍दी के प्राध्‍यापक और हिन्‍दी की उस समय की तमाम पत्र-पत्रिकाओं पहल,आलोचना आदि में आलोचना लिखने वाले भृगुनंदन त्रिपाठी के साथ मेरा रोज का घूमना शुरू हुआ। संकलन पढ़ उन्‍होंने राय दी कि तुम्‍हारे यहां दर्शन कविता पर हावी होता दिखता है उससे बचो , इस संकलन को स्‍थगित कर दो और जमकर पढो लिखो। मैंने उनकी बात पर अमल किया। संकलन कहीं समीक्षा के लिए नहीं भेजा यूं ही कुछ जगह भेजा जहां से पत्र आए उत्‍साहित करने वाले। इस पुस्‍तक पर ब्‍लर्ब इन्‍दौर प्रलेस के अध्‍यक्ष और कवि रामविलास शर्मा ने लिखा था। मैं पहले उन्‍हें आलोचक रामविलास शर्मा समझता था पर नवभारत टाइम्‍स में जब एक लेख छपा कि रामविलास शर्मा दो हैं तब मैंने यह बात जानी। पर शर्मा जी से मुझे पर्याप्‍त स्‍नेह मिला।

>समुद्र के आंसू पर आए पत्र – रामविलास शर्मा {कवि}

मार्च 22, 2008

>मध्‍यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ,इन्‍दौर रामविलास शर्मा अध्‍यक्ष27-4-88प्रिय भाई मुकुलआपका पत्र मिला। समुद्र के आंसू की प्रति भी। आद्यांत पढ़ गया हूं। आपके मन में भावनाओं का ज्‍वार है और परिवेश के प्रति सतर्क दृष्ठि भी। सामाजिक विसंगतियों के प्रति आक्रोश की एक लहर भी इन कविताओं में यत्र-तत्र विद्यमान है। प्रकृति ने आपके मन को छुआ है और उसकी सहज अभिव्‍यक्ति भी यहां मौजूद है।आप एक संभावनाशील कवि हैं। मेरी बधाई स्‍वीकारें।शेष शुभ।सस्‍नेहरामविलास शर्मागीतांजलि396,तिलक नगर,इन्‍दौर-452001/म.प्र.

>समुद्र के आंसू पर आए पत्र – विष्‍णु प्रभाकर

मार्च 22, 2008

>प्रिय बन्‍धु,आशा करता हूं आप स्‍वस्‍थ और प्रसन्‍न हैं। आपका पत्र मिला और पुस्‍तक भी। इधर मेरा स्‍वास्‍थ्‍य बहुत खराब चल रहा है आंखों में मोतिया बिन्‍द उतर रहा है इसलिए पढ़ना बहुत कष्‍टदायी हो गया है फिर भी आपकी कविताएं इधर उधर से पढ़ गया हूं। आपने आज के यथार्थ का मार्मिक चित्रण किया है। आपका उद्देश्‍य बहुत शुभ है और आपकी भाषा में भावों को अभिव्‍य‍िक्ति देने की शक्ति भी है। मुझे विश्‍वास है कि आपका भविष्‍य उज्‍जवल है।मेरी हार्दिक शुभकामनाएं स्‍वीकार करें।शेष शुभस्‍नेहीविष्‍णु प्रभाकर28/4/88818,कुण्‍डेवालान,अजमेरी गेट, दिल्‍ली-110006,फोन-733506

>समुद्र के आंसू पर आए पत्र – राजेन्‍द्र यादव

मार्च 22, 2008

>12/12/87प्रिय अमरेन्‍द्र जीआपका कविता संग्रह मिला। धन्‍यवाद। कविताओं में मेरी बहुत गति नहीं है,इसलिए अपनी राय को महत्‍वपर्ण नहीं मानता। अपने कुछ कवि मित्रों को दिखाकर उनकी प्रतिक्रिया जानने की प्रयास करूंगा। आशा है , स्‍वस्‍थ सानंद हैं।आपकाराजेन्‍द्र यादवश्री अमरेन्‍द्र कुमार मुकुलसहरसा

>समुद्र के आंसू पर आए पत्र – अरूण कमल

मार्च 21, 2008

>8/1/88प्रिय मुकुल जी, नमस्‍कार।नये वर्ष की मंगलकामनाएं स्‍वीकार करें।समुद्र के आंसू पुस्तिका मिली। आपके इस अनुग्रह के लिए हृदय से आभारी हूं। कविताएं मैंने पढ़ी हैं और कुछ पढ़ रहा हूं। खुशी की बात है कि आपने कविता से लौ लगायी है। इसे निरन्‍तर विकासमान रखें। कविता का क्षेत्र गहन कंटिल जटिल है-निरन्‍तर साधना से ही – होगी जय,होगी जय ।नागार्जुन,शमशेर,त्रिलोचन,केदार,मुक्तिबोध के साथ पूर्वर्त्‍ती तथा बाद के कवियों की कविताएं पढ़ें तथा मनन करें। कविता जहां पहुंच चुकी है,हमें उसके आगे जाना है। अभी आपकी उम्र कम है, इसलिए सिर्फ सीखना ही सीखना है। वैसे , हर कवि को अंतिम क्षण तक सीखना ही है। साथ साथ पढ़ाई पर भी ध्‍यान रखें। कवि को अपने समय का सबसे बड़ा विद्वान भी होना चाहिए। घर में सबको यथोचित। शुभकामनाओं और प्‍यार सहित आपका अरूण कमलमखनियां कुआं रोड,पटना-80004

>समुद्र के आंसू – सम्‍मति – डॉ.प्रभाकर माचवे

मार्च 19, 2008

>एक दिन मैंनेपूछा समुद्र सेदेखा होगा तूने, बहुत कुछआर्य, अरब, अंग्रेजों का उत्‍थान-पतनसिकन्‍दर की महानतामौर्यों का शौर्य,रोम का गौरवगए सब मिट, तू रहा शांतअब,इस तरह क्‍यों घबड़ाने लगा हैअमेरिका , रूस के नाम से पसीनाक्‍यों बार-बार आने लगा हैमुक्ति सुनी होगी तूने, व्‍यक्ति कीबुद्ध,ईसा,रामकृष्‍णसब हुए मुक्‍तदेखो तो आदमी पहुंचा कहांवो ढूंढ चुका है, युक्तिमानवता की मुक्ति काअरे, रे तुम तो घबड़ा गएएक बार, इस धराधाम की भीमुक्ति देख लोअच्‍छा तुम भी मुक्‍त हो जाओगेविराट शून्‍य की सत्‍ता सेएकाकार हो जाओगेलो,तुम भी बच्‍चों सा रोने लगेमैंने समझा था,केवल आदमी रोता हैतुम भी, अपना आपा इस तरह खोने !1987 में जब यह कविता लिखी थी और मेरे पहले संकलन समुद्र के आंसू में छपी तब वरिष्‍ठ कवि केदारनाथ सिंह का काफी प्रभाव था मुझ पर, इस कविता पर भी उसे देखा जा सकता है। उस समय इस पुस्‍तक को पढकर कवि आलोचक प्रभाकर माचवे ने एक पत्र लिखा था जिसमें एक जगह जहां उन्‍होंने प्रूफ की भूलें लिखीं वहीं अन्‍य कविताओं पर आलोचनात्‍मक राय भी दी। एक प्रकाशनार्थ सम्‍मति भी अलग से लिख दी थी जो उस समय छपने-छपाने की बहुत जानकारी और रूचि के अभाव के चलते कहीं छपी नहीं थी जब कि संग्रह की एक समीक्षा तब पटना से निकलने वाले दैनिक हिंदुस्‍तान में कवि मुकेश प्रत्‍यूष ने लिखी थी।प्रकाशनार्थ सम्‍मतिश्री अमरेन्‍द्र कुमार मुकुल का प्रथम कविता संग्रह समुद्र के आंसू श्री रंजन सूरिदेव तथा डॉ कुमार विमल की अनुशंसासहित प्रकाशित हुआ है। इसमें कवि के इक्‍यावन भावोद्गार हैं। इस संग्रह के अंतिम कवर पर छपी पंक्तियां सर्वोत्‍तम हैं – तुझे लगे/दुनिया में सत्‍य/सर्वत्र/हार रहा है/समझो/तेरे अंदर का/झूठ/तुझको ही/कहीं मार रहा है। सच-झूठयुवा बेरोजगार,खबर,चुनाव,मेरा शहर,रोल,बेचारा ग्रेजुएट,अपना गांव,सवालात में यथार्थ और व्‍यंग का अच्‍छा सम्मिश्रण है।ये रचनाएं चुभती हैं।कवि के अगले संग्रहों में और अच्‍छी कविताओं की आशा रहेगी।कविता न केवल वक्‍तव्‍य हेाती है,न राजनैतिक टिप्‍पणी।तत् त्‍वम् असि जैसी रचना से आशा बंधती है – प्रभाकर माचवे / नई दिल्‍ली / 3-1-88

>मां सरस्‍‍वती – कुमार मुकुल

मार्च 19, 2008

>
मां सरस्‍वती! वरदान दो
कि हम सदा फूलें-फलें
अज्ञान सारा दूर हो
और हम आगे बढ़ें
अंधकार के आकाश को
हम पारकर उपर उठें
अहंकार के इस पाश को
हम काट कर के मुक्‍त हों
क्रोध की अग्नि हमारी
शेष होकर राख हो
प्रेम की धारा मधुर
फिर से हृदय में बह चले
मां सरस्‍वती! वरदान दो
कि हम सदा फूलें-फलें!

मां सरस्‍वती शुद्ध गद्य है – यह कविता कैसे हुई। एक प्रार्थना मात्र है।इसे गद्य की तरह पढ़ें। क्‍या गद्य को तोड़-तोड़कर मुद्रित कर देने से ही कविता हो जाती है मात्राएं भी सब पंक्तियों की एकसी नहीं हैं:15,13,14,12 – यह पहली चार पंक्तियों की मात्राएं हैं – छन्‍द भी ठीक नहीं – डॉ.प्रभाकर माचवे/3-1-88

>अपने आज की झुर्रियां हम कल के चेहरे पर नहीं डाल सकते – संदर्भ – आलोक धन्‍वा

मार्च 18, 2008

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घर की जंजीरें
कितनी साफ दिखायी देती हैं
जब कोर्इ लड़की घर से भागती है

यह आलोक धन्‍वा की कूबत ही थी कि अपने घर की जंजीरें भी वे दिखला सके। वर्ना बाकी रचनाकारों के घर की सांकलों के पीछे झांकने की हिमाकत कौन कर सकता है …। हम तो वह ही देख सकते हैं जो वे दिखाएं। अरसे बाद इसबार पटना गया तेा आलोक जी को फोन किया तो उनकी एक सेविका ने कहा साहब नाश्‍ता कर रहे हैं। कुछ देर बाद उनका फोन आया और वे बोले कि शाम में सात बजे आएं तेा बातें हों, कुछ कविताएं भी लेते आएंगे अपनी। शाम गया पर अपनी कविताएं नहीं ले गया साथ थी ही नहीं नई कविताएं।
विष्‍णु भवन पहु्ंचा तो आपने फ्लैट में कुछ वैसी ही स्थितियों में थे जिस में साल भर पहले देखा था। उसी तरह एक पुरानी कुर्सी पर बैठे थे। जाड़ा अब नहीं था पर ओवरकोट डाले थे। पिछले महीनों वे जांडिश और फिर मलेरिया से उबरे, हड्डी का ढांचा थे। वैसे भी पिछले सतरह सालों से उस ढांचे पर कहां चर्बी चढ पायी कभी। हां एक चमक आती जाती रही। जाते ही वे शुरू हो गये। कौन चुप कराये उनकेा कि यह आपके हित में नहीं। बोलते समय कमजेारी से मुंह से चप चप की आवाज बीच बीच में आती थी।
तो यह मेरा सबसे प्‍यारा कवि था हमारे सामने। क्‍या उसे अपने बारे में कुछ बताने की जरूरत थी। मैं क्‍या हिंदी जगत जानता है उसे। वे दुखी थे प्रेमकुमार मणि के उस संपादकीय को लेकर जिसमें उन्‍हें लिजपिज और विनोबायी लिखा था उन्‍होंने। इन बातों का मेरे लिए कोई मतलब नहीं। जैसे हमारे पडोंसी पत्रकार श्रीकांत ने मणि जी के संपादकीय को लेकर कहा कि तब तो हम मणि जी को संघी कहेंगे जदयू और भाजपा से उनके रिश्‍ते को लेकर। पर मणि जी को जानने वाले जानते हैं कि वे संघ से बराबर लड़ते रहे हैं। उसी तरह जैसे आलोक जी को लोग उनके संघर्षों को लेकर जानते हैं। आज उनका या किसी का भी बुढापा या बीमारी के चलते आया लिजपिजापन कल के आलोक की लानत मलामत के काम नहीं लाया जा सकता। मणि जी भी मेरे प्रिय रचनाकारेां में हैं। उनके उपन्‍यास की ताकत को मैं नहीं भूल पाता। ढलान अपनी तरह का अकेला उपन्‍यास है उस पर बात नहीं हो सकी ठीक से, हर बार यह जरूरी भी नहीं। पर इससे उसका महत्‍व कम नहीं हो जाता। हमारे आज के चेहरे पर अगर झुर्रियां आती हैं तो उसे हम अपने युवा दिनों के चेहरे पर नहीं डाल सकते। हमारे प्रिय कवि और कथाकार के बारे में भी यही सही है।
मणि जी के साथ मैं आलेाक धन्‍व से ज्‍यादा रहा हूं। इस बार भी मिला और वाणी में रखने के लिए उनकी पत्रिका की प्रतियां भी साथ लाया। पहले साथ घूमते उन्‍होंने कर्इ बार पटना के कवियों की चर्चा करते कहा था कि अरूण कमल को चाहे जो पुरस्‍कार मिल जाये पर आलोक की कविता का कोई सानी नहीं। यही नहीं अरूण कमल की गद्य पुस्‍तक जब आयी तो उन्‍होंने यह कहकर दी थी कि बहुत रद्दी है इसे जिल्‍द लगा पढिएगा। खरीद लाया पर इसे लौटा दूंगा। हालांकि किताब उन्‍होंने लौटाई नहीं दुकानदार को पर उससे उनकी अरूण जी के बारे में राय तो जाहिर हो ही गयी थी। फिर मैंने अरूण कमल की भोगवादी भाषा के बारे मे लिखा भी थ न्‍यूजब्रेक में।
यूं अरूण कमल के मधुर व्‍यवहार का कोई सानी नहीं पर उसमें मिठास इतनी है कि अब उनसे बचता हूं , आखिर मेरी भी अब उमर हो गयी है इसलिए मीठे से थोड़ा परहेज जरूरी लगता है। उनके मधुर व्‍यवहार पर पहले संकलन में एक अच्‍छी कविता भी है मेरी।
संदर्भ आलेाक जी का था। तो वे परेशान थे और बताए जा रहे थे बौखलाहट में क्‍या क्‍या …। कि आज इतनी बीमारी के बाद भी गोष्ठियेां में जाने से बाज नहीं आता। वह तो है, उनका वक्‍तव्‍य भी उनकी कविताओं से कम ताकतवर नहीं होता इसे सब जानते हैं । कुछ लोग कहते हैं कि बातें दुहराते हैं वे तेा क्‍या केवल अपनी बातें ही दुहराते हैं हम अपना चेहरा नहीं दुहराते। फिर आलोक धन्‍वा ने ही लिखा है – कि छोटी सी बात का विशाल प्रचार करते हैं वे … इस शोषण और दमन की दुनिया में उनका दुहराव उनकी लड़ाई है और वही उनका चेहरा है….