जनवरी 2008 के लिए पुरालेख

>क्‍या बता सकता हूं मैं प्रेम के बारे में – कुमार मुकुल

जनवरी 30, 2008

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प्रेम के बारे में

क्या बता सकता हूं मैं
प्रेम के बारे में
कि मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है
सिवा मेरी आंखों की चमक के
जो जून की इन शामों में
आकाश के सबसे ज़्यादा चमकते
दो नक्षत्रों को देख
और भी बढ़ जाती है

हुसैन सागर का मलिन जल
जिन सितारों को
बार-बार डुबो देना चाहता है
पर जो निकल आते हैं निष्कलुष हर बार
अपने क्षितिज पर

क्या बताऊ मैं प्रेम के बारे में
या कि
उसकी निरंतरता के बारे में

कि उसे पाना या खोना नहीं था मुझे
सुबहों और शामों की तरह
रोज-ब-रोज चाहिए थी मुझे उसकी संगत
और वह है
जाती और आती ठंडी-गर्म सांसों की तरह
कि इन सांसों का रूकना
क्यों चाहूंगा मैं
क्यों चाहूंगा मैं
कि मेरे ये जीते-जागते अनुभव
स्मृतियों की जकड़न में बदल दम तोड़ दें
और मैं उस फासिल को
प्यार के नाम से सरे बाजार कर दूं
आखिर क्यूं चाहूं मैं
कि मेरा सहज भोलापन
एक तमाशाई दांव-पेंच का मोहताज हो जाए
और मैं अपना अक्श
लोगों की निगाहों में नहीं
संगदिल आइने में देखूं।

>त्रिलोचन ; दसों दिशाओं का सौरभ – कुमार मुकुल

जनवरी 13, 2008

>फूल मेरे जीवन में आ रहे हैं
सौरभ से दसो दिशाएं
भरी हुई हैं
मेरा जी विब्हवल है
मैं किससे क्या कहूं
यह अंतरंग विन्हलता और इसके पश्चात् इससे उपजे मौन और उल्लास के द्वंद्व से उद्वेलित जो dhavani की लहरों का ज्वार-भाटा है, वही हिंदी kअविता में त्रिलोचन की पहचान है? जटिल और सात रंगों के गतिमय मेल से उपजे सादे रंग की सुरभिमय लय-ताल। अपनी सहज और उपस्थिति से शनै:-शनै: हमारी संवेदना की जटिल बुनावट को रससिक्त करती हुई।
और यह यूं ही नहीं है कि तुलसी से भाषा सीखनेवाले इस महाकवि से इतर आ/kqनिक cks/k की जमीन के कवि केदारनाथ सिंह त्रिलोचन से काफी सीखते हैं और बादलों को पुकारते धान के बच्चों का जी उन्मन हो उठता है। ये धान के बच्चे नहीं हैं। आधुनिक टेक्नालॉजी में पिछड़े आज भी बारिस पर अपनी आशा टिकाए रखनेवाले भारतीय किसानों के बच्चे हैं। उसी तरह यह fog~oलताek= आत्मोद्वेलन नहीं है, इसमें चार नहीं दसो दिशाओं का सौरभ भरा है।
शाखाएं, टहनियां
हिलाओ, झकझोरो,
जिन्हें गिरना हो गिर जाएं
जाएं-जाएं
जीवन की शुष्कता को मिटाने के लिए एक निर्मम आलोड़न की जरूरत होती है। आलोड़न जो अपने सूखे, झड़ने को आतुर अंगों को किनारे पर ला पटकता है। वह निर्मम कोमल उद्घाटन जो बीज का आवरण फाड़ कर सर से मिट्टी को हटाता खुले आकाश में अपना अंकुर फेंकता है। उसकी गहरी पहचान gS f=ykspu को और अतीत के प्रति अतिरिक्त मोह नहीं है। श्रम और संवेदना की सूंड से इकट्ठा किया e/kqकोष वे eqDत मन से लुटाते हैं। दिनकर के शब्दों मेंµ
ऋतु के बाद फलों का रुकना
डालों का सड़ना है
यह निर्ममता बड़ी सजग है। वे कहते हैं कि जिसे मिट्टी में मिलना हो मिल जाएं मिट्टी में, पर अतीत और स्मृतियों का जो सौरभ है उसे भी मिट्टी में ना मिला दिया जाए और वे प्रार्थना करते हैं कि उस विरासत को हम संभाल कर आगे ले जाएं, क्योंकि जीवन की शुष्क राहों को यही सिक्त करेगा।
सुरभि हमारी यह
हमें बड़ी प्यारी है
उसको संभाल कर जहां जाना
ले जाना।
जब से कविता की दुनिया में विचारों का प्रवेश हुआ है जीवन को देखने का नजरिया बदला है। अब vis{kk की जाती है कि कविता में भाव और विचारों का संतुलन हो। यह नहीं कि भावनाओं की बाढ़ आती चली जाये और उसमें डूबते व्यक्ति की अपने विवेक पर से पकड़ छूट जाए। अब पाठक Lora= होता है कि भाव की नदी में डूबकर वह मोती ढूंढ़े या तट पर रहकर ही जल पान करता रहे। f=ykspu के यहां भावों में बह जाने का खतरा नहीं है। एक शब्द `नीरf=ykspu के यहां बराबर आता है। अपनी सहजता के साथ। यह त्रf=लोचन की अपनी विशेषता का द्योतक है। उनकी कविताएं भी कोई शोर-गुल नहीं करतीं। वो गया की उस नदी (फल्गु) की तरह हैं जिसका जल अगर पीना हो तो थोड़ा श्रम करना पड़ेगा। तल की रेत हाथों से हटानी होगी, तभी स्वच्छ प्रदूषण मुक्त अंतर/kkjk का पान कर सकेंगे आप।f=लोचन की कविता की एक प्रबल स्थिति उसका èkSर्य है। किसी भी स्थिति पर चिढ़कर वे आत्म हिंसक चोट नहीं करते, खुद को संगठित करते हैं वह अपनी सहयोगी अंत/kkराओं को क्रम से जोड़ते जाते हैं। जब-तक विसंगतियों को बहा ले जाने लायक दबाव ना पैदा हो।
मुक्ति चाहते हो तो आओ धक्के मारें
और ढहा दें
उद्यम करते कभी न हारें

हमारे घर
जितने ही निकट-निकट होते हैं
उतने ही दूर-दूर
हमारे मन
वे लिखते हैंµ
हृदय को हृदय से
मिलाने के लिए हंसी
सेतु है
( चित्रा जम्बोरकर )
अतीत और विश्व संस्कृति के सापेक्ष भारतीय संस्कृति की विरासत की शायद lokZf/kक सही समझ रखने वाले इस कवि की आंखों से आèkqनिक समाज की विसंगतियां और टूटन कभी ओझल नहीं रहे हैं, और वे बतलाते हैं कि इस जटिल युग में भी इस पारिवारिक टूटन का हल मात्र उन्मुक्त सरलता निश्छलता ही हो सकती है।निराला के बाद अगर किसी कवि ने भाषा, शैली, शिल्प के स्तर पर इतने fofo/k प्रयोग किए हैं तो वो f=ykspu ही हैं और यह fofo/krk कहीं भी उनकी मूल/kkjk को कमजोर नहीं करती। जाने कितना पानी है इस कवि की xaxks=h में कि इतनी mप /kjkvkas के बाद भी उसकी गहराई और गति में निरंतरता बनी रहती है

>पूरब की बेटी – बेनजीर – कुमार मुकुल

जनवरी 6, 2008

>१९८९ में बेनजीर शीर्षक से एक कविता लिखी थी मैंने , जो मेरी दूसरी कविता पुस्तिका ‘ सभ्यता और जीवन ‘ में संकलित है , अब बेनजीर के नहीं रहने पे वह कविता ‘कारवां’ के पाठकों के लिए ।

बेनजीर

पैराहन-ए -दरीदान में लिपटी
जिगर-फिगार अवाम की
अफ्सुर्दा आहों का मरहम-ए -आजार
संगीनों का सीना चाक करता
तमाम तवारीखों की तःरीरें करता तार-तार
माह-ए -रवां जो उगा है आज की शब
फैज़ के लैला-ए -वतन के अफलाक पर
दिलकश है बड़ी तस्वीर उसकी
सर -ए -रु पर है जवानी का फरोजां जमाल
रगों में इंसानी मुहब्बत की तासीर है
हाथों मे है हजारों द्रौपदिओं का चीर
पूरब की इस बेटी का नाम है
बे -नजीर बेनजीर ।

फटे वस्त्र , घायल दिल , उदास , घावों का मरहम , फाड़ना , लिखावट , गतिशील चांद, रात , आकाश , चेहरा , उज्जवल , सौंदर्य , मिठास , बेमिसाल