>पेरिस तक चमकती हिन्‍दी की बिन्‍दी और उसकी चिन्‍दी

>आज दो तरह की हिन्‍दी और उसके पाठक श्रोता हैं। एक वह हिन्‍दी है जिसकी बिन्‍दी पेरिस और लंदन तक चमकती है और दूसरी दुहाजू की बीबी वह हिन्‍दी है जिसमें निराला से लेकर रघुवीर सहाय तक कविता लिखते थे। जिसकी आज चिन्दियां उड़ रही हैं। हिन्‍दी की इस हालत को इंगित करती यह कविता पढिए। यह इसका पहला ड्राफ्ट है।

विश्‍व हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन – कृष्‍ण कल्पित

जिस भाषा में हम बिलखते हैं
और बहाते हैं आंसू
वे उस पर करते हैं सवारी
भरते हैं उड़ान उत्‍तुंग आसमानों में

एक कहता है मैं नहीं गया
मुझे गिना जाए त्‍यागियों में
एक कहता है मैं चला गया
मुझे गिना जाए भागियों में

एक आसमान से गिरा रहा था सूचियां
हिन्‍दी पट्टी के सूखे मैदानों पर

हिन्‍दी के एक नये शेख ने
बना रखा था सरकारी कमेटियों का हरम
एक से निकलकर
दूसरे में जाता हुआ

एक मूल में नष्‍ट हो रहा था
दूसरा ब्‍याज में और तीसरा लिहाज में
एक चिल्‍लाता था
मैं जीवन भर होता रहा अपमानित
अब मुझे भी किया जाए सम्‍मानित

एक कहता था
मुझे दिया जाए सारा पैसा
मैं उसका डॉलर में अनुवाद करुंगा
एक कहता था नहीं
सिर्फ मैं ही बजा सकता हूं
यह असाध्‍य बीणा

एक साम्राज्‍यावादी
एक समप्रदायवादी के गले में
फूलमालाएं डाल रहा था
एक स्‍त्री किसी निर्दोष के रक्‍त से
करती थी विज्ञप्तियों पर हस्‍ताक्षर

यह एक अजीब शामिल बाजार था
जिसमें एक बाजारू गायक
अश्‍लील भजन गा रहा था

एक सम्‍पादक विदेशराज्‍यमन्‍त्री के जूते में
निर्जनता ढूंढ रहा था
एक पत्रकार का
शास्‍त्री भवन की एक दराज में
स्‍थायी निवास था

एक कहता था मैं इतालवी में मरूंगा
एक स्‍पेनिश में अप्रासंगिक होना चाहता था
एक किसी लुप्‍तप्राय भाषा के पीछे
छिपता फिरता था

एक रूठ गया था
एक को मनाया जा रहा था
एक आचार्य
जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में कराह रहा था
एक मसखरा
मुक्तिबोध पर व्‍याख्‍यान दे रहा था

एक मृतक
ब्रिटिश एअरवेज के पंखों से लिपटा हुआ था
दूसरा मृतक
भविष्‍य में होनेवाली
सभी गोष्ठियों की अध्‍यक्षता कर चुका था
एक आत्‍मा
आगामी बरसों के
सभी प्रतिनि‍धीमंडलों में घुसी हुई थी

यह भूमंडलीकरण का अदभुत नजारा था कि
सोहो के एक भड़कीले वेश्‍यालय में
हिन्‍दी की लंगोट लटक रही थी

ओर दूर पूरब में
और धुर रेगिस्‍तान के किसी गांव में
जन्‍म लेता हुआ बच्‍चा
जिस भाषा में तुतलाता था
उसे हिन्‍दी कहा जाता था

कहां खो गया प्रतिरोध ‼
क्‍या भविष्‍य में सिर्फ
भिक्षाटन के काम आएगी
यह महान भाषा ‼

कभी इसी भाषा का एक कवि
दो टूक कलेजे के करता पछताता
लिखता जाता था कविता
और फाड़ता जाता था।

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2 Comments »

  1. 1
    shashi Says:

    >kalpitjibahut achchi kavita hai, kavita kya..hum sabaka shamil dukh hai. badhai.shashi bhooshan dwivedi


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