सितारों की कविता

जून 22, 2011

कुछ प्रकाशवर्षों तक

पहुंचती रहेगी मेरी रोशनी तुम तक

तब भी जब नहीं रहेगा मेरा अस्तित्‍व

इस रोशनी को ढूंढती
जब पहुंचोगी मंजिल तक

मैं बदल चुका होउंगा
एक ब्‍लैकहोल में
….

फिर
तुम ना पहुंच सकोगी मुझ तक

ना वापिस जा सकोगी

कहीं भी

इस ब्रहमांड में …..

>रक्तस्विनी – कुमार मुकुल

जून 14, 2011

>उसके पैरों में घिरनी लगी रहती है
अंतरनिहित बेचैनी में बदहवास
भागती फिरती है वह
इस जहां से उस जहां तक

सितारे
आ आकर मरते रहते हैं
उसके भीतर

जिन सितारों को
अपना रक्त पिलाकर पालती है वह

वे दम तोड़ देते हैं एक दिन
उसकी ही बाहों में
अपनी चमक उसे सौंपते हुए

यह चमक
कतरती रहती है
उसका अंतरतम

सितारों की अतृप्त अकांक्षाएं
हर पल उसे बेचैन रखती हैं
वह सोचती है कि
अब किसी सितारे को
मरने नहीं देगी अपनी पनाह में
और रक्तस्विनी बन हरपल
उनके लिए प्रस्तुत
भागती रहती है वह
इस जहां से उस जहां तक …

>बरिश और कीचड से आबाद बचपन – कुमार मकुल

मई 27, 2011

>

चाँद  पर आवास  दीनानाथ सहनी  का चौथा  कविता संग्रह है। इसमें जीवन-जगत को लेकर कवि के सहज, सरल उद्गार और संबोधन हैं। विकास को लेकर कवि का अपना नजरिया है, वह लकीर पीटने में विश्वास नहीं करता बल्कि चीजों को वर्तमान संदर्भों में अपने ढंग से विष्लेश्ति करता है। चांद पर मानव बस्तियां बसने वाली हैं। भविस्य  की इन बस्तियों को लेकर बहुत उत्साहित नहीं वह ,क्योंकि वह जानता है कि आदमी महत्वाकांक्षा के घोडे  पर सवार है ,कि कल को चांद को भी बेषक वह धरती बना देगा ,वहां भी पेड-पौधे ,नदी-नाले होंगे पर बंधक बने कामगार भी वहां होंगे और सबसे बडा कवि का दुख यह है कि वहां चंदामामा का गीत नहीं होगा। चांद को लेकर लिखी पहली कविता के बाद पृथ्वीवासियों को संबोधित कविता भी उसी भाव का विस्तार है। इसमें भी वह कहता है कि – चांद पर मानव बस्तियां बसने से पूर्व / पृथ्वी पर गृविहीनों को आवास मिले।
    चाँद  पर जाने की तमाम महत्वाकांक्षी योजनाओं के बीच वह अपने देश  को याद करता है, मुरदों का देश  इसे कचोटता है क्योंकि यहां करूण का अभाव है,क्योंकि यहां श्रमिक जन का तिरस्कार है, पर कवि खुद को जानता है  कि वह – सरल किसान-कुल का बेटा है।
    कवि दलित, श्रमिक वर्ग का प्रतिनिधि है और अपनी ताकत का उसे भान है – मैं नहीं था आदि नफरत करने का / फिर भी मुझ पर जुल्म ढहाए गए/ मेरे बनाए हथियारों से निर्दोष  औरतों व बच्चों पर हमले किए गए
    कवि  की पीडा है  कि  वह अतीत की ओर ,जीवन के प्राचीन  श्रोतों की ओर लौटना चाहता है। अपनी जान की कीमत पर भी लौटने की  ईच्छा है उसकी। बारिश  और कीचड से आबाद उसका बचपन उसे आवाज देता है, वह उसकी ताकत है, यह कहने का साहस वह करता है, यही बातें उसे वर्तमान के नकलची कवियों से अलगाती है , जिनकी ना जडें हैं, ना जडों की पहचान और ना जडों से जुडने की ईच्छा।
    दीनानाथ को पढते कहीं-कहीं पाब्लो नेरूदा की कविताओं की अंतरलय का अहसास होता है – मुझे प्यार है मछुआरों से /जो समुद्र की लहरों से खेलते हैं  /चूमते हैं और चल देते हैं…/ फिर कभी नहीं लौटते।  नेरूदा भी कुछ ऐसा ही लिख चुके  हैं – वे चूमते हैं और चल देते हैं मौत से हमबिस्तर होने के लिए।
    व्यवस्था के प्रति कवि का आक्रोष गहरा है जो कहीं कहीं उसके स्वर को विद्रूप कर देता है, पर यह सहज है, रोते हुए कोई अपना चेहरा खुशनुमा कैसे दिखा सकता है – सरकारी कुत्ते /मंहगाई को सूंघते फिरते हैं /… बैंकों में शेयर  बाजारों में/ माल और मंडियों में /मंहगाई कहां है /…महंगाई तो / आज भी गा रही है अपने गीत / निरीह-गरीब जनता के आंसुओं में।
    बाजार के तमाम प्रपंचों से नष्ट  की जा रही धरती और उसके जनों के लिए गहरी करूणा और आशा  है कवि में । वह कुआं को पृथ्वी का उपहार पुकारता है और बच्चों के कठोर होते नेत्रों में/जनक्रांति का प्रतिबिम्ब देखता है।
    जीवन की जद्दोजहद को उसके विभिन्न रंगों रूपों व ध्वनियों के साथ अभिव्यक्त किया है कवि ने पर उसे संपादन पर भी ध्यान देना चाहिए। 160 पेज के इस संकलन से पचास पेज छांट दिए जाते और भाषा  पर कुछ और काम होता तो संग्रह और प्रभावी होता।

>पिता के संस्मरण

मई 19, 2011

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  पिता को लेकर पहली याद रात को सोने जाने को लेकर है। खाने के बाद मैं पिता के पेट पर पैर देकर सो रहता था और वे कहानियां सुनाते थे, जीव जंतुओं वाली। शेर, बाघ, बगुला,केंकडा,सियार आदि वाली कहानियां जो आम भारतीय किसी न किसी से सुनते हैं या आगे जाकर पढते हैं। पिता से इस तरह कहानियां सुनना सबसे मजेदार अनुभवों में है। मां बहुत छुआ छूत मानती थीं  इसलिए लगता है मुझे उनकी संगत याद नहीं। आज भी पोते पोतियों को भी वे अपने बिछावन पर नहीं आने देतीं। यह सब आज एक मनोरोग में बदल चुका है जिससे मां निजात चाहती हैं, डाक्टर विनय से एकाध बार मैंने दवाएं भी ली हैं मां के लिए पर…।

    पिता अच्छे शिक्षक और कडे प्रशासक थे। उनका विषय अंग्रेजी था पर हम हमेशा पसंद करते कि वे हिन्दी का हमारा क्लास लें। चूंकि इस क्लास में भी वे कथाओं के माध्यम से शिक्षा देते थे जो हमें बहुत पसंद आता था। आज भी उनका क्लास में जयद्रथ वध की पंक्तियां सुनाना याद है – सिर कटा जयद्रथ का मस्तक निर्दोष पिता का चूर्ण हुआ। अंग्रेजी की तो यह हालत थी कि टवीशन पढने आने वाले छात्रों के हर बैच में वे मुझे बिठा देते थे। नतीजा अंग्रेजी के क्लास में जब वे नैरेशन या टेंश कुछ भी बनाने को देते तो कापी में मैं जवाब ही लिखता था और उनका बोलना समाप्त होते ही मैं कापी जमा कर देता था क्लास के जो तेज लडके थे वे यह देख हतप्रभ हो जाते थे। शेक्सपीयर के नाटक भी मैं दिन रात घोंटता रहता था। पर इस अतिरिक्त अंग्रेजीदां दबाव का ही नतीजा था कि आगे मैंने अंग्रेजी पर जरा ध्यान नहीं दिया। आज तक मैं अंग्रेजी से भागता हूं। हालांकि शुरू में कुछ कविताएं मैंने अंग्रेजी में लिखीं और दर्जनों कविताओं के अंग्रेजी से अनुवाद किए जो छपे भी पर मैं कभी भी खुद को अंग्रेजी के सामन्य जानकार के रूप में भी जाना जाना पसंद नहीं करता ।
    पहले अरसे तक मैं डायरी लिखा करता था पर पिता थे कि मेरी अच्छी खासी डायरी में गलतियां काट कर उसे बदरंग कर डालते थे। संभवतः इसी का नतीजा है कि अब मैं कहीं भी अपनी गलतियों को काटकर सुधारता नहीं, मन में होता है कि मैं जान ही रहा हूं  तो अब इसे सुधारना क्या…किसी बताना है …खुद ही को ना…।
    जिला स्कूल इंटर कालेज के प्रिंसीपल के रूप में पिता की बडी ख्याती थी। सहरसा में जिला स्कूल को ही लोग जानत े थे तब। चूंकि वहां पढाई तो होती ही थी परीक्षा मे चोरी नहीं होती थी। अगर किसी स्कूल का सेंटर वहां पडता तो उसका रिजल्ट खराब हो जाता था चोरी नहीं होने के कारण।
    ईमानदारी का तगमा पिता उम्र भर धारण किए रहे। एक बार हुआ यह कि कहीं खेलते हुए मैंने एक बेकार सी पडी कार के पेट्रोल टैंक का ढक्कन खोल लाया था किसी ने पिता को कह दिया फिर मेरी वह पिटायी हुयी कि …। इसी तरह एक बार कुत्ते के एक पिल्ले को मैं कान से उठाए उसका रिरियाना सुन रहा था कि सामने पिता पड गए, फिर तो थोपियाते हुए घर ले आए कि यह लडका तो बहुत दुष्ट है कल भी यह छिपकली को मार रहा था।
    बाजार जाते समय पिता मुझे साथ ले जाते। यह अच्छा और बुरा दोनों हाता। अच्छा यह कि मैं जानता होता कि आज पंजाबी की दुकान से रसगुल्ले और बालशाही खाने को मिलेंगे। पर रास्ता कैसे कटेगा यह सोच हमेशा डरा रहता मैं। रास्ते में पिता गणित के सवाल पूछते जाते और गलत होने पर एकाध चमेटा कहीं भी रसीद कर देते। नतीजा गणित में कभी मुझे अच्छे नंबर नहीं आए। बाजार जाते हमेशा यह डर रहता कि हाथ का झोला कहीं गिर ना जाए, यह मनोवैज्ञानिक दबाव की वजह से था।
    मैट्रिक तक मुझे कभी खेलने कूदने की छूट नहीं मिली नतीजा आगे एमए तक मैं खेलता ही रहा। पर पिता खुद फुटबाल के खिलाडी थे और गेंद जैसी गोल चीज को बिना हाथ लगाए पैरों पर उठाकर शाट लगाना उन्होंने ही सिखाया था। इसी तरह नदी में तैरने की भी ट्रेनिंग वे देते थे। धारा में लाकर मुझे छोडे देते कहते हाथ पांव मारो। मैं डूबता नाक में पानी जाने से चीखता किनारे भागने की कोशिश करता। तैरना भी मैं कभी ढंग से नहीं सीख सका। जब कि मेरे छोटे भाई बहन जो गर्मी की छुट्टी में एक माह के लिए गांव जाते बाकी बच्चों के साथ आसानी से खेल खेल में तैरना सीख गए थे। मैं तैरना इतना ही सीख सका कि कहीं भी डूब जाउं। मैं ताकत से तैरता था कुछ दूर जहां तक बाहें चलतीं पर गहरे पानी में भी निश्चिंत हो छप छप करते रहना मुझे नहीं आया कभी। जबकि पिता सांस फुला कर शव की तरह बीच धारा में बिना हाथ पांव हिलाए बहते जाने का करतब भी दिखलाते थे। ….जारी

>आखिरी सालों में पिता

मई 17, 2011

>

पिता की क्रिया के दौरान घर में रिश्ते के सारे लोग जुटे थे। पिता को लेकर तमाम चर्चाएं होती रहती थीं। मां की ईच्छा के अनुसार मुझे अनिच्छापूर्वक गरूड़पुराण का पाठ सुनना पड़ रहा था। इस दौरान मैंनें पुराण पर लिखने के लिए तमाम नोट्स लिए। सोचा कि इस पुराण पर कानूनन रोक लगनी चाहिए क्योंकि इसमें सती प्रथा की महिमा का बखान किया गया है और तमाम गड़बडि़यां हंै जिन पर आगे लिखूंगा। इस बीच मां अक्सर पिता के सपने में आने की चर्चा करते रोने लगतीं बहन पूछतीं कि क्या मुझे सपने में पिता आते हैं। पर मेरे सपने में पिता कभी नहीं आए। पर इन सवालों के बाद मैं पिता के बारे में सोचने लगता। तब मार तमाम बातें याद आतीं।
    इधर अब घर खाली हुआ लोगों से तो मैंने पिता की रैक पर पड़ी चीजों को तलाशा कि जानूं कि इन आखिरी सालों में पिता क्या सोचते-गुणते थे। पिता पुजारी किस्म के थे पर उन्होंने कभी घर में किसी पर पूजा के लिए दबाव नहीं डाला। उनकी रैक में रामचरितमानस हमेशा रहती थी। आक्सफोर्ड की एक डिक्शनरी जो उन्हें 1964 में ब्रिटिश काउंसिल द्वारा प्रेजेंट की गयी थी, भी हमेशा साथ रहती थी। इधर मेरी किताबों की रैक से कुछ किताबें उन्होंने अपने रैक पर ला रखीं थीं। जिनमें पंचतंत्र, हितोपदेश आदि थीं। लेनिन की राज्य और क्रांति और कम्यूनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र भी इधर के दिनों में उनकी रैक पर दिख रही थी। ये किताबें मैंने 1984 में एक डेढ रूपये में पटना स्टेशन गोलंबर से खरीदी थीं जो हाल के दिनों में ऐसे ही आलमीरे से निकाल बाहर ला रखी थी। इसके अलावे भक्तिगीतों की दो किताबें थीं, जिनमें एक बहन ले गयी। गांधी के प्रिय भजनों का संग्रह भी हाल के दिनों में उनके बिछावन पर रहता था। वे अंग्रेजी शिक्षक थे सो ग्रामर की एक पुरानी किताब उनके साथ चली आ रही थी अरसे से। उनके कालेज के कोर्स का पोएट्री सेलेक्शन जो कभी मैंने संभाल रखी थी वह भी वहां थी। इसके अलावे होम्योपैथी की एकाध किताब और एक किताब सपनों के विश्लेषण पर।
    फिर मैने बाकी कागज पत्तर भी खंगाल डाले उनके। कोई भी बात लिखने के पहले वे श्रीराम अवश्य लिखते थे। इस तरह श्रीराम के बाद वे क्या क्या लिखते थे यह जानना रोचक रहा मेरे लिए। एक जगह उन्होंने इकबाल की पंक्तियंा लिख रखी थी-अय आबे मौजे गंगा, वह दिन है याद तुझको, उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा…चीनो अरब हमारा…मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहां हमारा। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त का अनुवाद दो जगह उन्होंने हाथों से लिख रखा था जिनमें प्रकृति के रहस्यों के बारे में अपने ज्ञान की सीमा के बारे में लिखा गया है- इसके पहले सत भी नहीं था, असत भी नहीं, अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था, छिपा था क्या कहां किसने ढका था….।
    एक जगह उन्होंने एक श्लोक और उसका अर्थ लिखा था-जिसका किया हुआ पाप उसके बाद में किए हुए पुण्य से ढक जाता है, वह मेघ से मुक्त चंद्रमा की भांति इस लोक को प्रकाशित करता है। धूप जब भी सहने योग्य रहती पिता उसमें घंटों बैठे रहते थे। एक जगह उन्होंने ऋग्वेद से सूर्य के महत्व को लेकर लिखी ऋचाएं अर्थ के साथ नोट कर रखीं थीं। कृष्ण को लेकर लिखे गए श्लोक उन्होंने दो जगह नोट कर रखे थे- अधरं मधुरं, वदनं मधुरं, मधुराधिपतेरखिलं मधुरं…।
    एक जगह तुलसी की कुछ मार्मिक पंक्तियां नोट कर रखी थीं उन्होंने – ममता तू न गई मेरे मन तें। पाके केश जनम के साथी लाज गयी लोकनतें। तन थाके कर कांपन लागे जोति गयी नैनन तें। एक जगह दिनकर की पंक्तियां टंकी थीं – समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध। जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।
    अपने काम की बातें पिता अंग्रेजी में लिखते थे पर सबके काम की बातें हिन्दी में या दोनों भाषाओं में। एक जगह उन्होंने कुछ सूक्तियां नोट कर रखी थीं – जो संयम, इमानदारी, अभिमान, गरीबी आदि पर थीं। लिंकन की पंक्तियां उन्हें पसंद थीं कि – महत्वपूर्ण सिद्धांत लचीले होने चाहिए। दादा दादी दोनों मंगल को मरे थे यह उन्होंने नोट कर रखा था खुद वे सोमवार को गुजरे। हिन्दी फिल्म का एक गीत – बहारों फूल बरसाओं …भी उन्होंने पूरा नोट कर रखा था।
    इंटर तक पिता मुझे हिमालय की तरह अटल अडिग लगते थे पर बी.ए. के बाद से जो उनसे वैचारिक टकराव आरंभ हुआ तो वह दस साल पहले तक चलता रहा जबतक कि मैं बाहर नहीं रहने लगा। अब लगता है कि मैं कुछ ज्यादा कठोर हो जाता था। पर हाल के दस सालों में वे हम लोगों के प्रति एक हद तक निश्चिंत हो गये थे। गीता के स्थितप्रज्ञ के लक्षण उन्होंने मुझे रटा रखे थे। मैं स्थितप्रज्ञता को अपने लिए गुण नहंी मानता पर पिता के लिए वह गुण ही था। इसके बल पर ही वे हमलोगों की विपरीतता को सहकर भी शांत रहते थे। जब पहला हर्ट अटैक हुआ था तो पिता खुद जाकर भर्ती हुए थे। हास्पीटल में जब डाक्टरों ने कहा कि आपको हार्ट अटैक है और आप अकेले इस दूसरे फ्लोर पर कैसे चले आए। फिर वे दस दिन बेड पर आइसीयू में रहे। इसी दौरान हम पिता के निकट आए। और उनका क्षोम हमलोगों से कम होता गया।

    यह अच्छा हुआ कि इलाज के नाम पर पिता अंतिम दिनों में दिल्ली हमलोगों के साथ रहे। हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि पिता कभी हमारे साथ रह सकते हैं। अब उनके लिए अलग पूजाघर और मां को हर घड़ी हाथ धोने की बीमारी और पिता मां कभी अलग रह नहीं सकते। पर पिता मां आए रहे और हमारे बिखरे परिवार को भी अनजाने में एक कर गए। यह आश्चर्यजनक था कि अपने परिवार से अलग अकेले रहने के बारे में साथ रहते पिता ने कभी सवाल तक नहीं किया। मैं तीन साल से अकेला रह रहा था। पिता की उपस्थिति ने जैसे हम पति-पत्नी के बीच की बहस को अप्रासंगिक कर दिया। हम साथ हो गए भले हमारे मन साथ नहीं हांे, और यह होना भी नहंी है, चीजें फिर पीछे नहंी लौटतीं। हमारे साथ रहने और पहले के अलग रहने में कोई मौलिक भेद नहीं है सिवा इसके कि हम साथ दिख रहे हैं। बच्चों के लिए हमारे साथ रहने और अलग रहने का कोई मानी नहीं है, वे इसे एक समस्या की तरह लेते हैं। जिसका उनके पास कोई निदान नहीं। पर पिता मां की उपस्थिति ने दिखने के स्तर पर हमें एक कर डाला यह छोटी बात नहीं क्योंकि हमारी सामाजिकता के लिए दिखना ही मुख्य पहलू है। इस दौरान आभा ने भी सब भूल कर पिता के लिए  दिन रात एक कर दिया । बच्चो ने भी जाना कि पिता क्या होते हैं।

    मैं पिता की तरह नहीं हो सका, या पिता ही नहीं हो सका। बडे बेटे ने एक दिन कहा था – पापा आप ऐसे कैसे हैं….मैंने पूछा- मतलब। उसने कहा – नहीं, मेरे सभी दोस्त कहते हैं, तुम्हारे पिता इतने फ्रैडली कैसे हैं…। मैं हंसा – ओह। अच्छा तो है। वह बहुत खुश था कि सबके पिता उनकी अधिकांश बातों पर बिगडते रहते हैं पर उसके साथ ऐसा नहीं है। …जारी

>अब पिता हैं कि मानते नहीं मुझे

अप्रैल 26, 2011

>

पिछली 18 अप्रैल को पिता का देहांत हो गया। हालांकि घर में सब को लगा रहा है कि वे कहीं गये हैं और कभी भी लौट आएंगे….

पिता
अपनी छोटी गुदाज हथेली में
पिता की अंगुलियां थामे चल रहा था मैं
दूर सामने बहती नदी तक जाना था मुझे
नन्हें पांव थकने लगे थे रोने लगा था मैं
बिठा लिया था पिता ने तब कंधे पर अपने
बालों से उनके खेलने लगा था मैं निकटाने लगी थी नदी
पर सूरज उपर कसा जा रहा था
रोने लगा था मैं दुबारे
उतार दिया पिता ने तब चिलचिलाती रेत पर
बिल-बिलाकर चिपक गया था मैं बाहों में उनकी

फिर पास आ गयी थी नदी
भीगी रेत पर घरौंदे बनाए थे मैंने
चिल्ला-चिल्लाकर बुलाया था पिता को
आओ देखो यह घल मेला अपना घल
पर पिता से पहले आ गयी थी एक लहर
रूंआसा हो गया था मैं भयभीत भी
कि मेरा घर बहा ले जाने वाली यह लहर
मुझे तो नहीं ले जाएगी बहा कर….

अब कह रहे थे पिता
चलो तैरना सिखला दूं तुम्हें रोने लगा था मैं
पर कितने कठोर थे पिता
दुःसाध्य था कितना
इतिहास की सुरंगों से
वर्तमान के काल-खंडों तक
संचित
ज्ञान उनका

तब
ममत्व की बाहों से उठा
ले आए थे पिता
नदी की धारा में
धीरे से छुलाया था
सतह की नदी से
बोले मारो हाथ-पांव मारो
चीखें मारने लगा था मैं
और टप से छोड दिया था पिता ने
धारा में मुझे
बहता हाथ-पांव चलाता
डूबने लगा था मैं
समाने लगी थी नदी
मेरी आंखों में बाहों में रगों में
थोडा-थोडा होष
खोने लगा था मैं

आंखें खुलीं तो टंगा था मैं बांहों में पिता की
सोचा था कितनी लंबी हैं बाहें पिता की
लहरों से भी लंबी

क्या मैं नहीं हो सकता पिता की तरह
किनारों को छोड धारा में बना नहीं सकता घर
और कूद गया था मैं
बाहों के बल नदी में
आंखें खुली थीं भाग रहा था धारा में मैं
मछलियों के आगे-पीछे
देखता छू-छूकर तल में फैली कौडियां-सीपी-सिवार
बचता मगरों घडियालों के जबडे से
थकने लगता
तो लहरों से भी लंबी पिता की बाहें
थाम लेती थीं मुझे

आज हो चुका हूं कद्दावर पूरा
छूने लगे हैं नदी का तल मेरे पांव
और हाथ सहला रहे हैं चेहरा सूरज का

अब पिता हैं कि मानते नहीं मुझे
कहते हैं वहीं तक जाओ
लौट सको सुरक्षित जहां से मेरी बाहों में

पर तुम्हारा यह पवित्र मोह
हमारे अंतर के भविश्योन्मुख उर्जस्वित आवेग को
बांध सकेगा पिता
खुद बंध सके थे तुम ……..

१९८८  में पिता द्वारा छपवाए  गए  कविता  संकलन  सभ्यता  और  जीवन  से 

>तुम्‍हारी उदासी के कितने शेड्स हैं विनायक सेन

अप्रैल 16, 2011

>जानता हूं विनायक सेन
बीमारी अंधकार और लौहदंडों के घेरे में
दम घुट रहा है तुम्‍हारा
दम घुट रहा है जनाकांक्षाओं का
पर देखो तो
तुम्‍हारी उदासी उद्भासित हो रही है कैसी
बज रही है कितने सुरों में
कि कतने शेड्स है इसके

यहां बाजू में घास पर बैठे हैं मंगलेश जी
चुप्‍पा हकबकाए से
आधा सिर हिलाते
कि नहीं
ठीक ऐसा नहीं है
कि जिगर फिगार अवाम की कीमत पर ली गयी
उधार की यह चमक
मुझे मंजूर नहीं

पास ही घुटनों के बल झुकी हैं भाषा सिंह
विस्‍फारित नेत्रों में बच्‍चों सा विस्‍मय भरे
अपने धैर्य को मृदु हास्‍य में बदलती
कुछ बतिया रही हैं रंजीत वर्मा से
वहीं उबियाए से बैठे हैं मदन कश्‍यप,रामजी यादव
कि तमाशा खडा करना हमारा मकसद नहीं
दाएं बाजू सामने चप्‍प्‍ल झोला रखे
बैठे हैं अजय प्रकाश
अपनी खिलंदडी मुस्‍कान के साथ
सरल हास्‍य में डूबी नजरों से ताकती प्रेमा को दिखलाते
कि वो तो रही नंदिता दास
वही
फिराक वाली नंदिता दास
दीप्‍ती नवल की खनकती निगाह को
यतीम कर दिए गए बच्‍चे के दर्द में डुबोकर
जड कर देने वाली नंदिता दास

उधर पीछे खडे हैं अभिषेक
अपनी ही चर्बी के इंकिलाब से अलबलाए
कि भईवा इ पानी है कि गर्म चाय
पास ही मुस्‍का रहे हैं अंजनी

कितने शेड्स हैं तुम्‍हारी उदासी के
उधर कितने अनमने से खडे हैं अनिल चमडिया
कि साहित्‍य अकादमी की धूमिल होती इस सांझ में
शामिल हो रहा है रंग खिलते अमलतास का
कि बजती है एक अंतरराष्‍ट्रीय धुन
कि सब तुम्‍हारे ही लिए हैं मेरी कुटुबुटु
कि चलता है रेला लोकधुन का
और फुसफुसते हैं लोग
कि यह राजस्‍थानी है कि गुजराती
कि भुनभुनाता है एक
कि यहां इस प्रीत के बोल की जरूरत क्‍या है

जरूरत है साथी
कि प्रीत के बोलों पर
अभिषेक और ऐश्‍वर्या की ही इजारेदारी नहीं
कि वे अपनी भूरी कांउस आंखों पर भी
कजरारे-कजरारे गवा लें
और पूरा मुलुक ताकता रह जाए
मुलुर-मुलुर

कि इन बोलों पर
फैज – नेरूदा – हिकमत का भी अधिकार है
कि प्रीत के बोलों पर उनका ही अधिकार है
जो अपनी धुन में चले चलते हैं
मौत से हमबिस्‍तर होने के लिए

हां ये सब
तुम्‍हारी उदासी के ही शेड्स हैं विनायक सेन
उदासी की ही धुन है यह
जिस पर नाच रहे हैं इतने सारे जन-गन
बौद्धिक-कवि-पत्रकार
सबको लग रहा है कि
यह उदासी है
कि वे हैं।

पाखी  अक्टूबर  अंक  में  प्रकाशित 

Posted in विनायक सेन. फैज – नेरूदा – हिकमत. दीप्‍ती नवल. नंदिता दास  |  1 Comment »

>हमलोगों का नाम कितना घटिया है पापा ….

मार्च 28, 2011

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आदमी होकर सिंह, बाघ का टाइटल लगाते शर्म नहीं आती 
चार पांच साल से देख रहा हूं कि बेटे जब तब भुनभुनाने लगते कि पापा हमलोगों का नाम कैसा है…। मैं पूछता- कैसा है…। कैसा है क्‍या…एकदम घटिया है… छोटा बेटा भुनभुनाता…. यह कोई नाम हुआ …मम्‍मी आभा सिंह, पापा अमरेन्‍द्र कुमार, मुकुल, मैं अभिषेक रत्‍नम भैया पीयूष नारायण। स्‍कूल में टीचर, लडके कहते हैं कि तुम लोग क्‍या हो कुछ पता ही नहीं चलता। पीयूष ने भी जोडा- हां पापा, सब समझते हैं कि हम दक्षिण भारतीय हैं , रत्‍नम वहीं के लोग लगाते हैं। सबके नाम में सिंह रहना चाहिए था , इस पर सहमति थी क्‍योंकि मम्‍मी, बाबा और नाना के नाम में सिंह है।  और नाम के मामले में उन्‍हें लगता था कि मम्‍मी सही हैं।
       यह सब सुनकर मुझे गुस्‍सा आता, मैं कहता कि आदमी होकर सिंह, बाघ का टाइटल लगाना , शर्म नहीं आती। स्‍पष्‍ट है कि किसी बात को समझाने के, कन्विंश करने के ,मामले में गुस्‍साकर कुछ भी कहना सबसे बेहूदा तरीका है। पर जिस तरह से सिंह पर सबकी सहमति थी और मम्‍मी की बांछें खिल जाती थीं, गुस्‍सा आना स्‍वाभाविक था। पर चूंकि अपनी बेवकू‍फियों पर भी मैं नजर रखता हूं इसलिए मैं ऐसे समय का इंतजार करने लगा जब बिना गुस्‍सा के मैं अपना पक्ष रख सकूं।
       आखिर चार पांच साल बाद यह मौका आया। मम्‍मी को तो कुछ भी समझाना कठिन है पर बच्‍चे जैसे जैसे बडे होते गए उनकी ज्ञान पिपासा को शांत करने के दौरान मैं उनकी चेतना को वैज्ञानिक रूझान देने की कोशिशि करता रहता था। नतीजा सात साल की उम्र तक बच्‍चे ईश्‍वर के अस्तित्‍व को समझ गए थे और अब आस्‍था या भावुकता के दबाव में उन्‍हें इस संबंध में कुछ भी उटपटांग समझाना संभव नहीं था। घर में उनके बाबा, नाना सब पुजारी किस्‍म के थे। बच्‍चे जब छोटे थे तब पापा को बेवकूफ समझते थे कि पापा को इतना भी पता नहीं कि ईश्‍वर होता है…। पर जब जीवन से संबंधित अपनी जिज्ञासा को वे ईश्‍वर से जोड कर कुछ पूछते तो मेरा जवाब उन्‍हें इस संबंध में आश्‍वस्‍त करता जाता कि ईश्‍वर जैसी कोई चीज नहीं। और उसी उम्र से वे यह समझने लगे कि यह एक मानसिक स्थिति है, और इसे किसी को जोर देकर समझाया नहीं जा सकता जब तक कि उसकी जिज्ञासा नहीं हो।
      इधर एक दिन मैंने बच्‍चों को गांव में बहुत पहले बाघ के आने और उसके मारे जाने की कहानी सुनायी तब से वे जब तब पूछने लगे थे कि और कुछ बताइए। तो अबकी मैंने उन्‍हें जाति पर व्‍याख्‍यान दे देना जरूरी समझा। मैंने कहा कि सिंह टाइटल उस जमाने का है जब आदमी सिंह को जंगल का राजा समझता था। फिर यह एक छोटी सी जाति को इंगित करता है जो जग जीत लेने के मिथ्‍या दंभ में छाती फुलाए घूमती फिरती है। ऐसे टाइटल वालों की हालत भी वैसी ही होनी है जैसी कि सिंह की आज हो चुकी है।
       मैंने कहा कि मेरे नाम में सिंह बाघ नहीं है , और यह नाम पिता ने ही रखा है। चूंकि पिता अपने जमाने के पढे लिखे आदमी रहे हैं सो उन्‍होंने काफी पहले इस टाइटल की निस्‍सारता पहचान ली थी। बाबा पास ही थे तो बच्‍चे उनसे पूछ बैठे- उनका जवाब था कि उन्‍होंने देखा कि जाती के आधार पर उस समय बिहार और देश भर में सिरफुटौवल चल रही है, खून खराबा हो रहा है तो मैंने सोचा कि बच्‍चों को इस सबसे बचाने के लिए जरूरी है कि उनके नाम में एसे टाइटल ना जोडें।
       पिता अंग्रेजी के शिक्षक रहे और हिन्‍दी साहित्‍य पर भी उनकी पकड वैसी ही रही है सो हम दोनों भाइयों का नाम उन्‍होंने प्रसाद की एक ही कविता से चुना लिया था मेरा मुकुल और छोटे का किसलय। पुकार का नाम मुकुल तो चल गया पर किसलय की जगह गुडडू चला । मेरा नाम पिता ने अमरेन्‍द्र कुमार रखा था सर्टिफिकेट में। पर चेतना के विकसित होने के साथ मुझे यह नाम भी पसंद नहीं आ रहा था क्‍योंकि इसमें अमर और इन्‍द्र जैसे शब्‍द थे। इन्‍द्र से मुझे चिढ सी है , क्‍योंकि वह एक आततायी आर्य राजा रहा है। सो आगे मैंने अपने पुकार के नाम मुकुल को ही मुख्‍य नाम की तरह बरतने लगा। और आज वही जिन्‍दा है। …….जारी

     

 

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>साहित्‍य अकादमी का कलमाडीकरण या नया विकास

मार्च 26, 2011

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आज साहित्‍य अकादमी और रमणिका फाउंडेशन के संयुक्‍त तत्‍वावधान में देश भर की तमाम भाषाओं की कवयित्रियों का सम्‍मेलन था। मणिपुरी,बांग्‍ला,मलयाली,कश्‍मीरी,उदू,अंग्रेजी और हिन्‍दी अदि तमाम भारतीय भाषाओं की कवयित्रियों ने कविताएं पढीं। पूरे‍ दिन का चार सत्रों का कार्यक्रम था। ऐसी गहमा गहमी कभी कभी ही दिखती है। देखकर सुखद आश्‍चर्य हो रहा था। पर पिछले वर्षों में जिस तरह अकादमी का आधुनिकीकरण हो रहा है उसके कुछ नमूने भी दिखे। हाल तो अब चकाचक हो गया है। और उसका किराया भी हजार की जगह दस हजार से उपर हो गया है।
       चलिए यह भी ठीक है। इस व्‍यवस्‍था में विकास ऐसा ही होता है। वैसे भी आकदमी और सैमसंग की गंठजोड पर बबाल हो ही चुका है। ऐसे में आज के कार्यक्रम के दौरान अकादमी के आधुनिकीकरण के कुछ नमूने यहां पेश करता हूं।
        कई सत्रों में कार्यक्रम होने के चलते लोग बीच में उठ कर बाहर घूम टहल आ रहे थे। मैं भी बीच में युवा कवि अच्‍युतानंद के साथ बाहर के पार्क नुमा बची जगह में जा बैठा। हम बैठे ही थे कि वहीं एक ओर बैठा गार्ड पास आया और सूचना दी कि यहां बैठने की मनाही है, कि ऐसा किन्‍हीं राजकुमार वर्मा के आदेश से है। हमलोगों ने कहा कि ऐसा है तो यहां लिख कर टांग दो कि यहां बैठना मना है। इस पर वह अपने बॉस के पास गया और लौटा तो बोला कि वर्मा जी आपलोगों को बुला रहे हैं। हमने कहा उन्‍हें ही भेज दो यहां। गार्ड फिर वर्मा जी के पास गया और लौटा तो कुछ नहीं बोला।
        इस बीच हमने ध्‍यान दिया कि जहां हम बैठे हैं वहां की सारी घास सूखी है, कोई घेरा भी नहीं है वहां। उल्‍टा बगल का खेत जुता हुआ सा है और धूल उडकर आ रही है। फिर जिस घेरे की घास पर बैठने से रोका जा रहा था उसी के एक हिस्‍से में घास पर एक टूटी कुर्सी लगी है गार्ड के बैठने के लिए। अगर पार्क की घास बचानी है तो कुर्सी को घेरे के बाहर रखना चाहिए था। फिर अगर सुंदर दिखने का मामला हो तो ऐसी टूटी कुर्सी गार्ड को देना कौन सी सौदर्य दृष्टि है।

        फिर हमने इधर उधर ध्‍यान दिया तो पाया कि अकादमी के मेन गेट पर जिन दो खंभो पर जो छत टिकी है , वे खंभे नीचे से चणक कर टूट रहे हैं और वह छत कभी भी गिर सकती है, यह आप तस्‍वीर में देख सकते हैं कि खंभे कैसी स्थिति में हैं। अब सोचने की बात है कि तमाम सौंदर्यीकरण में लगी अकादमी की व्‍यवस्‍था को हम सूखी घास पर बैठ कर उसे गंदी करते तो दिखते हैं पर मुख्‍य दवार पर ढहता खंभा जो कभी भी किसी की जान को खतरा पहुंचा सकता है, नहीं दिख रहा है।

      
इसी तरह जब गोष्‍ठी का आरंभ हो चुका था पर कुछ लोग अभी चाय पी ही रहे थे तो एक अखबार के पत्रकार मित्र जो वहां आयोजन की खबर लिखने को आए थे चाय का कप लेकर भीतर जा बैठे तो पीछे से एक सज्‍जन ने आकर उन्‍हें कहा कि आप बाहर जाकर चाय पीएं।
      ठीक है , चाय बाहर जाकर पी जा सकती है और घास को हरी देख कर खुश हुआ जा सकता है पर इसे करने का एक तरीका होना चाहिए और पहले तमाम चीजों को दुरूस्‍त करने के बाद ही लोग खुद इन चीजों का ख्‍याल करेंगे। पर ऐसे खेत नुमा मैदान और टूटे खंभों से गुजरने के बाद लेखक बिरादरी अलग से सौंदर्य सचेत हो यह सहज नहीं।
    

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>मानसिक रोगों की पहचान की समकालीन प्रणाली अविश्वसनीय है – डीएल रोजेनहन

मार्च 23, 2011

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मन क्या है, इस सवाल पर अपने अध्यक्षीय भाषण में विचार करते हुए डॉ.एम.थिरूनावुकरसु कहते हैं कि यह शर्मनाक है कि अभी तक हम इस महत्वपूर्ण सवाल का कोई समुचित उत्तर नहीं तलाश पाए हैं। कि मन को लेकर किसी भी सहमति तक पहुंचने में हमने ऐतिहासिक अक्षमता प्रकट की है। इसकी जड में जाते हुए वे बताते हैं कि जिसने भी इस पर अपने मंतव्य रखने की कोशिश की उसे जैसी आलोचना व बहिष्कार से गुजरना पडा कि लोगों ने इस पर विचार करना ही बंद कर दिया। उनका मानना है कि हम मानसिक बीमारियों की व्याख्या के प्रश्न की उपेक्षा में सफल हो गए और मन की व्याख्या की भी उपेक्षा कर रहे हैं। उनका मानना है कि आज हम जिस नयी विचारधारा के समक्ष हैं वह है मानसिक स्वास्थ्य, जिसकी व्याख्या भी शेष है।

मनसिक स्वास्थ्य की व्याख्या के संदर्भ में थिरूनावुकरसु मनोवैज्ञानिक डीएल रोजेनहन के प्रयोग की चर्चा करते हैं। 1973 में रोजेनहन ने अपने अध्ययन ऑन बीईंग सेन इन इनसेन प्लेसेज को साइंस पत्रिका में छपवाकर तहलका मचा दिया था। उन्होंने दो प्रयोग किए थे। पहले में उन्होंने आठ सामान्य लोगों को छद्म रोगी बनाकर बारह अस्प्तालों में उपस्थित कराया था। आठ में तीन महिलाएं थीं और पांच पुरूषों में एक रोजेनहन भी थे। । सबने एक ही बीमारी श्रवण मतिभ्रम की शिकायत की। सबकी शिकायत थी कि उन्हें धमाका और सांय सांय की आवाज लगातार सुनाई देती है। रोजेनहन जानना चाहते थे कि क्या मनोचिकित्सक छद्म रोगियों की पहचान कर पाते हैं। पर यह शर्मनाक था कि तमाम विश्वविद्यालयों और अस्पतालों के मनोचिकित्सकों ने सात छद्म रोगियों को स्किजोफ्रेनिया का मरीज करार दिया। सिर्फ एक को मैनिक डिप्रेशिव सायकोसिस का शिकार माना गया।

इन सब को सात से बावन दिन तक भर्ती रखा गया। भर्ती होने के बाद इन्होंने अपनी बीमारी की शिकायत बंद कर दी और अस्पतालों के काम काज का लेखा जोखा लेने लगे। सबने दोस्ताना सहयोगपूर्ण व्यवहार किया और इसी रूप में उन्हें वहां दर्ज भी किया गया। पर किसी को भी अस्प्ताल में रहते सामन्य नहीं घोषित किया गया। इन सबको सायकोट्रॉपिक दवाएं दी गयीं जिन्हें ये आंख बचाकर फेंक दिया करते थे। सबको यह मानकर छुट्टी दी गयी कि वे स्किजोफ्रेनिया इन रेमिसन के शिकार और विक्षिप्त थे और अब बेहतर हैं।

रोजेनहन के इस प्रयोग की जब पोल खुल गयी तो एक अस्प्ताल ने दावा किया कि ऐसी गलतियां उसके संस्थान में नहीं होंगी। रोजेनहन ने तब यह सूचना दी कि वे अगले तीन महीनों में छद्म रोगियों को वहां भर्ती के लिए भेजेंगे। तीन महीनों के दौरान अस्पताल ने 193 मरीज भर्ती किए जिनमें 21 प्रतिशत को अस्पताल ने छद्म रोगी करार दिया। जब कि रोजेनहन ने खुलासा किया कि उसने कोई छद्म रोगी इस दौरान नहीं भेजा।

इस आधार पर रोजेनहन का निष्कर्ष था कि मानसिक रोगों की पहचान की समकालीन प्रणाली अविश्वसनीय है। रोजेनहन का सवाल था कि अगर सामान्य व्यवहार और पागलपन दोनों का अस्तित्व है तो हम उन्हें जानेंगे कैसे…। डॉ थिरूनावुकरसु का कहना है कि रोजेनहन के प्रयोगों के पैंतीस साल बाद आज भी उन सवालों का हमारे पास उचित उत्तर नहीं है…. जारी
इंडियन सायकाएट्रिक सोसाइटी के वार्षिक अधिवेशन में 17-1-2011 को दिये गये भाषण के आधार पर ।

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